सोच को अपनी ले जाओ शिखर तक; कि उसके आगे सारे सितारे झुक जाएं;
न बनाओ अपने सफ़र को किसी कश्ती का मोहताज चलो इस शान से कि तूफ़ान भी झुक जाए।
जय आर्य , जय आर्यावर्त

"धरा जब-जब विकल होती,मुसीबत का समय आता.
किसी न किसी रूप में ,कोई न कोई महामानव चला आता.."

कांग्रेस के जन्म से भी दस वर्ष पूर्व आर्य समाज के माध्यम से महर्षि दयानंद ने स्वराज्य का प्रथम उद्घोष कर दिया था.२६ फरवरी ,१८८३ ई. को संपन्न 'सत्यार्थ प्रकाश'में उन्होंने लिखा है कि,माता-पिता के समान होने पर भी विदेशी राज्य स्वराज्य की बराबरी नहीं कर सकता.ध्यान देने की बात यह है -इस समय तक कांग्रेस की भी स्थापना नहीं हुयी थी और तथाकथित हिन्दू महासभा,आर.एस.एस.,मस्लिम लीग आदि का कोई अत-पता भी न था.बंग-भंग आन्दोलन से भी बहुत पूर्व स्वामी जी ने स्वदेशी वस्तुओं का स्वंय व्यवहार करके तथा दूसरों को भी ऐसा ही आग्रह करके स्वदेशी आन्दोलन को जन्म दिया था.महर्षि दयानंद के प्रिय शिष्य क्रांतिवीर श्याम जी कृष्ण वर्मा उनकी अनुमति लेकर लन्दन चले गए और वहां उन्होंने 'इण्डिया हाउस 'की स्थापना की और 'इन्डियन सोशियोलाजिस्ट 'नामक पात्र निकाल कर विदेशी शासकों की धरती पर ही उसे उखाड़ फेंकने का आह्वान कर शेर को उसकी मांद में ही चुनौती दे डाली.महर्षि दयानंद की प्रेरणा और आशीर्वाद ही श्याम जी कृष्ण वर्मा के मुख्य सम्बल थे.कुछ ही समय में लन्दन का इण्डिया हाउस क्रांतिकारियों का अखाड़ा बन गया जहाँ शरण लेने वालों में जलियाँ वाला काण्ड के नर-पिशाच जनरल डायर का वध करने वाले सरदार ऊधम सिंह का नाम विशेष उल्लेखनीय है.

सत्यार्थ प्रकाश के अध्ययन द्वारा ही काकोरी काण्ड के अमर शहीद राम प्रसाद 'बिस्मिल'ने शाहजहांपुर में 'आर्य कुमार सभा'की स्थापना कर बच्चों व नव-युवकों में समाज व देश सेवा का शंखनाद फूंक डाला था.आर्य कुमार सभा रूपी बिस्मिल की इसी फैक्टरी में अशफाक उल्ला खां,ठाकुर रोशन सिंह आदि देशभक्त नौजवान तैयार हुए थे,इसी लिए दिसंबर १९२७ ई. में उनकी फांसी के पश्चात देश में यह नारा गूँज गया था-

मरते बिस्मिल,रोशन ,लाहिड़ी,अशफाक अत्याचार से.
होंगे सैंकड़ों पैदा इनके खून की धार से..

आर्य सन्यासी स्वामी सोमदेव जी तथा डी.ए.वी.स्कूल इटावा के शिक्षक क्रांतिकारी गेंदा लाल दीक्षित ने तो क्रांतिकारी युवकों की एक फ़ौज ही खड़ी कर डी थी जो छल व बल से स्थापित ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने को कृत -संकल्प थी.पंजाब के क्रांतिकारी लाला हरदयाल (जो माथुर कायस्थ)तथा परमानंद,सरदार भगत सिंह, आजाद आदि आर्य समाजी ही थे.अंग्रेज सरकार आर्य समाज को एक राजद्रोही आन्दोलन ही समझती थी जैसा कि,सर वेलेंटाईन शिरोल ने "इन्डियन अनरेस्ट "नामक पुस्तक में स्वीकार भी किया है."एवरीमैन"के विश्वकोश के पृष्ठ ४५१ पर तो आर्य समाज को स्पष्ट रूप से एक ऐसा राजद्रोही संगठन कहा है जिसका उद्देश्य देश की आजादी रहा है.ब्रिटिश शासक स्वामी दयानंद को रिवोल्यूशनरी सैन्ट कहा करते थे.

ऐसा नहीं है कि आर्य समाज ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को सिर्फ क्रांतिकारी ही भेंट किये हों,वरन लाला लाजपतराय,श्रद्धानंद सरीखे आर्य नेता और असंख्य आर्य समाजी गांधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन में जेल गए थे.डा.पट्टाभि सीतारमैया ने "कांग्रेस का इतिहास"नामक पुस्तक में लिखा है कि,स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने वाले कांग्रेसियों में ८५ प्रतिशत आर्य समाजी थे.वास्तव में गांधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन को जन-आन्दोलन बनाने में आर्य समाज का योगदान महती रहा है.गांधी जी के आन्दोलन को पिछड़ों,दलितों व महिलाओं का योगदान सिर्फ इसी लिए मिल सका कि,आर्य समाज ने डी.ए.वी.स्कूलों के माध्यम से शिक्षा का प्रसार कर युवकों को जाग्रत कर दिया था,कन्या पाठशालाओं और कन्या गुरुकुलों को खोल कर महिलाओं को पुरुषों से भी श्रेष्ठ अर्थात मातृ -शक्ति घोषित कर दिया था.आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद की ही दूर- दर्शिता थी कि उन्होंने हिन्दी को राष्ट्र -भाषा घोषित कर दिया था जिसका अनुसरण महात्मा गांधी ने किया और इस प्रकार जन-जन तक सत्याग्रह का सन्देश सरलता से पहुंचाया जा सका.दलितों को न केवल पढने बल्कि वेदों को पढ़ने का भी अधिकार आर्य समाज ने ही प्रदान किया और इस प्रकार उन्हें मुख्य धारा में जोड़ कर स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने की प्रेरणा प्रदान की.

निष्कर्ष यही है कि,महर्षि दयानंद तथा उनके आर्य समाज ने अपने युगान्तर कारक क्रांतिकारी कार्यक्रमों के माध्यम से भारत की सोयी हुयी तरुणाई को जगा कर माँ की बलिवेदी पर समर्पण हेतु कटिबद्ध किया जिसके आधार पर भारत की स्वाधीनता का महान संग्राम अवरत लड़ाया गया और अन्तोगत्वा भारत १५ अगस्त १९४७ को स्वतन्त्र हुआ.आर्य समाज से ही प्रेरणा पा कर युवकों ने एक कवि के शब्दों में-

देश हित वार दीं,अनेक ही जवानियाँ.
जिनके खून से लिखी ,स्वदेश की कहानियां..