Bande_Hain_Hum_Uske.mp3-bestwap.in
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झरनों से संतोष न करना सारा सागर पाना है , नीले आसमान  की तरह इस दुनिया पर छाना है ,,,,,,,,             "जय आर्य जय आर्यावर्त "

जब सब कुछ आपके विरुद्ध हो जाये तब याद रखिये हवाई जहाज हवा के विरुद्ध ही उडान भरता है , 

                           i will win not "IMMEDIATELY" but "DEFINITELY"

हजारो मंजिल होगी . हजारो कारवा होगे 
                                                     निगाहे हम को ढूढेंगी . न जाने हम कहा होगे 








                      यूँ ही जरा खामोश जो रहने लगे हैं आर्य , लोगों ने कैसे कैसे फसाने बना लिये ।                                 


                                      हम मरते मरते भी नाम अपना कर जायेगे , 
                                           हौसला है दिल में कुछ कर के दिखायेगें |                         


अंग्रेजो के समय मैकोय्ले और मैक्स मुलर ने मिल के एक षणयंत्र रचा के आर्य बाहर से आये थे | उनका उद्देश्य इस से भारत मे फूट डालो राज करो की निति को जोर देना था | उनकी इस बात का तुरंत तो उतना प्रचार ना हो सका | क्यों की ऋषि दयानंद तो जीवित थे ही उन्होंने तुरंत ही खंडन किया इस सिद्धांत का “जब आर्यो के कोई ग्रन्थ इस बात की पुष्टि नहीं करते तो ये बात क्यों माने“ | पर इस से हिंदू शब्द के प्रचार मे तेजी आई | हिंदू शब्द के विषय मे ऋषि दयानंद के शब्द थे “ऐ भाइयो ! कर्मभ्रष्ट तो हो गए हो, नाम भ्रष्ट तो ना होइये”
कितना उत्तम कथन था उनका |
स्वतंत्रता के आन्दोलन मे क्रांतिकारी आर्य भाषा का प्रयोग करते थे, आर्य शब्द पर कोई विवाद ना था | सन १९५० तक राष्ट्रीय स्वय सेवक संघ के गीत मे “नमो वत्सले आर्य भूमि” की पंती रही फिर ये आर्य भूमि से हिंद भूमि हो गया | शायद आज़ाद हिंद फ़ौज की वजह से और जय हिंद के नारे की वजह से | आजादी के बाद काले अंग्रेजो के शासन काल मे हम वैदिक धर्म से अधिक दूर होते गए और उतने ही दूर शुद्ध शब्दों से | दुखद बात तो ये है के आर स स जैसे बड़े और श्रेष्ठ संगठन ने भी समझौता कर लिया | कोई हमारा उत्तम अर्थ वाला नाम उच्चारण ना कर पाए और हमे पोपटलाल नाम दे दे तो क्या हम उसे स्वीकार कर लेंगे | तब भी नहीं जब वो बहुलता मे हो जाये क्यों की वो हमारा नाम ही नहीं तो स्वीकारता कैसी | अब प्रश्न ये हैं के अगर हम हिंदू शब्द को स्वीकार कर लेते हैं ये भूलते हुए के ये नाम मुसलमानों कि गुलामी के समय हमे मिला तो भी इसके घटिया अर्थ हमारी विवेकशीलता पर प्रश्न उठाएंगे | फिर अगर हम अर्व वासियो के मोहम्मद पूर्व के अर्थ को ले तो प्रथम तो वो हमे वर्तमान मे प्रचलित ना मिलेंगे द्वतीय कल को कोई और अर्थ रख देगा परसों कोई और तब कहा तक कौन कौन सा शब्द लेंगे | जब इस शब्द का कोई अर्थ ही नहीं हैं तो इसे सिर्फ इसके प्रचलन की वजह से स्वीकार करना बुद्धिमत्ता ना होगी | हम लोगो को बताये तो सही की हम आर्य हैं और हिंदू शब्द आया कहा से | हां हिंदू शब्द उनके लिए जरुर प्रयोग कर सकते हैं जो सीताराम जैसे नाम होते हुए राम के अस्तित्व को ही नकारते हैं | दिग्विजय होते हुए भी आर्यो की विश्व दिग्विजय की बात उनको हजम नहीं होती तो इनके लिए ये शब्द रखा जाए तो बुरा नहीं | अब आप क्या हैं इस आधार पर आर्य य हिंदू ये आप निर्धारित करिये |
पर जो जागरूक हैं वेदों पर आस्थावान हैं राम, कृष्ण, दयानंद व अन्य आप्तो के पथ अनुगामी हैं उसके लिए हिंदू शब्द तो अपमान सामान होगा वह तो आर्य कहलाने लायक हैं | फिर वेद का वचन हम क्यों भूल जाते हैं जिसमे परमात्मा कहता हैं
“अहं भूमिं अददाम आर्याय |”
यानी उसने ये भूमि आर्यो को दी हैं | इस भूमि पर पवित्र हृदय लोग ही शासन करने के लिए हैं |
इस लिए गर्व से कहो हम आर्य हैं | और वेद आज्ञा अनुसार विश्व को आर्य बनाये
|| कृण्वन्तो विश्वार्यम ||

तुम कहो गर्व से हिन्दू हो पर हिन्दू होने के लिए तुमने किया क्या ?
बस जन्म लिया हो गए हिन्दू इसमें झंडा गाडा क्या ?
"हम चले सत्य पे बलिदानी बन तभी ईश्वर हमें आर्य पुकारा है , इस बलिदानी परंपरा में एक छोटा नाम हमारा है"

स्वामी दयानन्द के योगदान के बारे में महापुरुषों के विचार

डॉ. भगवान दास ने कहा था कि स्वामी दयानन्द हिन्दू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता थे।
श्रीमती एनी बेसेन्ट का कहना था कि स्वामी दयानन्द पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने आर्यावर्त (भारत) आर्यावर्तीयों (भारतीयों) के लिए की घोषणा की।
सरदार पटेल के अनुसार भारत की स्वतन्त्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानन्द ने डाली थी।
पट्टाभि सीतारमैया का विचार था कि गान्धी जी राष्ट्रपिता हैं, पर स्वामी दयानन्द राष्ट्र–पितामह हैं।
फ्रेञ्च लेखक रोमां रोलां के अनुसार स्वामी दयानन्द राष्ट्रीय भावना और जन-जागृति को क्रियात्मक रुप देने में प्रयत्नशील थे।
अन्य फ्रेञ्च लेखक रिचर्ड का कहना था कि ऋषि दयानन्द का प्रादुर्भाव लोगों को कारागार से मुक्त कराने और जाति बन्धन तोड़ने के लिए हुआ था। उनका आदर्श है-आर्यावर्त ! उठ, जाग, आगे बढ़। समय आ गया है, नये युग में प्रवेश कर।
स्वामी जी को लोकमान्य तिलक ने "स्वराज्य का प्रथम सन्देशवाहक" कहा।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने "आधुनिक भारत का निर्माता" माना।
अमरीका की मदाम ब्लेवेट्स्की ने "आदि शङ्कराचार्य के बाद बुराई पर सबसे निर्भीक प्रहारक" माना।
सैयद अहमद खां के शब्दों में "स्वामी जी ऐसे विद्वान और श्रेष्ठ व्यक्ति थे, जिनका अन्य मतावलम्बी भी सम्मान करते थे।"

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